ये रात बड़ी कमीनी चीज़ है , चाँद का लट्टू जलाकर सितारों की चादर देकर रूमानी कर देती है फिर अपना डर ऐसा फैलाया हुआ है की महबूबा आने से डरती है और जब हम उसके ख्वाबो का तकिया बनाकर उसके लफ्जों को झूठा करते हुए उसके बदन की चादर ओढ़ते हैं तो न जाने कहाँ से लाख वाट का लट्टू जलाकर कोनसे मुल्क निकल जाती है ,
वो आज भी उसके नाम की कसमों से घबराता है , वो चाँद से मन्नत में उसको ही तो चाहती है । वो यारों में आज भी उसका जन्मदिन मनाता है , वो मेहँदी में आज भी उसका नाम छिपाती है । वो बंद अकेले कमरे में रोता है - चिल्लाता है , वो TEDDY को नम आँखों से उसकी कहानियाँ सुनाती है । वो सोचता है खुश होगी वो शायद उसके यूँ चले जाने से , वो आज भी समाज की हदों में बंध जाती है।