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Wednesday, 17 July 2013

जरा लकीरों को किस्मत लिखने तो देता

"जरा मोहब्बत का रंग चखने तो देता
जरा अमीरी का सुरूर छड़ने तो देता
क्यूँ हर कदम में twist देता है उपरवाले
जरा लकीरों को किस्मत लिखने तो देता "|।

शिकवा

तेरे अक्स को पलकों पे पिरो लिया है मैंने
शिकवा ये है की तुझे याद नही करता मैं ।

Story of Rose

Story of Rose : On Rose day
किसी उन्स का , किसी मोहब्बत का
मुखबिर बनूंगा
या आज फिर तेरे
तकिये के नीचे मरूँगा
तू हर रोज़ , एक rose को मारता है
तू क्यूँ घबराता है
क्यूँ इश्क को छुपता है
आज मैं भी उससे मिलना चाहता हूँ
मेरी कीमत पे जिसको
तू हर रोज पाना चाहता है। :)

GOOGLE पे नहीं मिलती है

"शब्दों के खेल से नज्में निकलती है
ये GOOGLE पे नहीं मिलती है !" ;)

न जाने कैसी नौटंकी है इन लफ्जों की

पिछले कुछ दिनों से
इन लफ्जों ने
न जाने क्यूँ मुहं फुलाया हुआ है
न जाने कैसी नौटंकी है
जब भी
इनको चुपचाप
किसी पन्ने पर बेठाता हूँ
कुछ लकीरों में खुदको कैद कर
छुप जाते है कहीं
और मैं परेशान सा
इनको ढूंढे ही जा रहा ...,
जैसे मेरा उन्स गुम है
तेरे दिल से
मिलता ही नहीं अब
न ही कोई मुआवजा है ,
कहीं ये भी गुम न जाए
इनकी तो कोई
report भी नही होती ।

Thursday, 4 July 2013

हकीकत !

हकीकत
**************
हर रोज
चाँद लेकर अपनी कश्ती
रात की झील में उतरता है
चांदनी के जाल में
तारा एक नहीं फसता
और फिर से
उदास हुए
छुप जाता है कहीं

पत्थर की मूर्ति में
पूरी आवाम को गिरफ्तार देखकर
rational समझ वाले लोग
उदास हुए
छुपे रहते है कहीं

आदमी हज़ार तरकीबे लगाता है
उसकी ज़िन्दगी से मौत को इश्क न हो
देह फिर भी
चिता की आगोश में छुप ही जाता है ।
~ तपिश

Wednesday, 5 June 2013

हमारे बस का नहीं

सर्द मौसम की हर अलसाई सुबह
एक प्याली चाय पिला पाएंगे आपको
चाँद - तारें लाना,
हमारे बस का नहीं |


और तेरे हर अश्क पे
मुस्कान चढा सकते हैं हम,
जन्नत जैसा घरौंदा ,परियो वाले वादें
हमारे बस का नहीं || :)
~ तपिश